पौराणिक
विश्लेषण से यह साफ़ है कि कुम्भ पर्व एवं गंगा नदी आपस में सम्बंधित हैं। गंगा प्रयाग
में बहती हैं परन्तु नासिक में बहने वाली गोदावरी को भी गंगा कहा जाता है, इसे हम गोमती
गंगा के नाम से भी पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को काशी की उत्तरी
गंगा से पहचाना जाता है। यहाँ पर गंगा गंगेश्वर
की आराधना की जाती है। इस तथ्य को ब्रह्म पुराण एवं स्कंद पुराण के 2 श्लोकों
के माध्यम से समझाया गया है-
" विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्तरे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते । "
" एव मुक्त्वा गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्वरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये। "
ज्योतिषीय गणना के अनुसार
कुम्भ का पर्व 4 प्रकार से आयोजित किया जाता है :
1. कुम्भ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुम्भ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है।
" पद्मिनी नायके मेषे कुम्भ राशि गते गुरोः । गंगा द्वारे भवेद योगः कुम्भ नामा तथोत्तमाः।। "
2. मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुम्भ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है।
" मेष राशि गते जीवे मकरे चन्द्र भास्करौ । अमावस्या तदा योगः कुम्भख्यस्तीर्थ नायके ।। "
एक अन्य गणना के अनुसार
मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति
का प्रवेश होनें पर कुम्भ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।
3. सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुम्भ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है।
" सिंह राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ । गोदावर्या भवेत कुम्भों जायते खलु मुक्तिदः ।। "
4. सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है।
" मेष राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ । उज्जियन्यां भवेत कुम्भः सदामुक्ति प्रदायकः ।। "
कुम्भ पर्व उज्जैन
उज्जैन का अर्थ है विजय की नगरी और यह मध्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। इंदौर से इसकी दूरी लगभग 55 किलोमीटर है। यह क्षिप्रा नदी के तट पर बसा है। उज्जैन भारत के पवित्र एवं धार्मिक स्थलों में से एक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है। महाभारत के अरण्य पर्व के अनुसार उज्जैन 7 पवित्र मोक्ष पुरी या सप्त पुरी में से एक है। उज्जैन के अतिरिक्त शेष हैं अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरमऔर द्वारका। कहते हैं की भगवान शिव ने त्रिपुरा राक्षस का वध उज्जैन में ही किया था।
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