flipkart top

शुक्रवार, 29 मई 2015

भगवान शिव के 108 नाम और उनके अर्थ

भगवान शिव के 108 नाम और उनके अर्थ

1. शिव अर्थात जो कल्याण स्वरूप

2. महेश्वर अर्थात जो माया के अधीश्वर

3. शम्भू अर्थात जो आनंद स्वरूप वाले

4. पिनाकी अर्थात जो पिनाक धनुष धारण करने वाले

5. शशिशेखर अर्थात जो सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले

6. वामदेव अर्थात जो अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले

7. विरूपाक्ष अर्थात जो भौंडी आँख वाले

8. कपर्दी अर्थात जो जटाजूट धारण करने वाले

9. नीललोहित अर्थात जो नीले और लाल रंग वाले

10. शंकर अर्थात जो सबका कल्याण करने वाले

11. शूलपाणी अर्थात जो हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले

12.खटवांगी अर्थात जो खटिया का एक पाया रखने वाले

13. विष्णुवल्लभ अर्थात जो भगवान विष्णु के अतिप्रेमी

14.शिपिविष्ट अर्थात जो सितुहा में प्रवेश करने वाले

15.अंबिकानाथ अर्थात जो भगवति के पति

16.श्रीकण्ठ अर्थात जो सुंदर कण्ठ वाले

17.भक्तवत्सल अर्थात जो भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले

18.भव अर्थात जो संसार के रूप में प्रकट होने वाले

19. शर्व अर्थात जो कष्टों को नष्ट करने वाले

20. त्रिलोकेश अर्थात जो तीनों लोकों के स्वामी

21.शितिकण्ठ अर्थात जो सफेद कण्ठ वाले

22. शिवाप्रिय अर्थात जो पार्वती के प्रिय

23. उग्र अर्थात जो अत्यंत उग्र रूप वाले

24. कपाली अर्थात जो कपाल धारण करने वाले

25. कामारी अर्थात जो कामदेव के शत्रुअंधकार

26.सुरसूदन अर्थात जो अंधक दैत्य को मारने वाले

27. गंगाधर अर्थात जो गंगा जी को धारण करने वाले

28. ललाटाक्ष अर्थात जो ललाट में आँख वाले

29. कालकाल अर्थात जो काल के भी काल

30.कृपानिधि अर्थात जो करूणा की खान

31.भीम अर्थात जो भयंकर रूप वाले

32. परशुहस्त अर्थात जो हाथ में फरसा धारण करने वाले

33. मृगपाणी अर्थात जो हाथ में हिरण धारण करने वाले

34.जटाधर अर्थात जो जटा रखने वाले

35.कैलाशवासी अर्थात जो कैलाश के निवासी

36.कवची अर्थात जो कवच धारण करने वाले

37.कठोर अर्थात जो अत्यन्त मजबूत देह वाले

38.त्रिपुरांतक अर्थात जो त्रिपुरासुर को मारने वाले

39.वृषांक अर्थात जो बैल के चिह्न वाली झंडा वाले

40.वृषभारूढ़ अर्थात जो बैल की सवारी वाले

41. भस्मोद्धूलितविग्रह अर्थात जो सारे शरीर में भस्म लगाने वाले

42. सामप्रिय अर्थात जो सामगान से प्रेम करने वाले

43.स्वरमयी अर्थात जो सातों स्वरों में निवास करने वाले

44. त्रयीमूर्ति अर्थात जो वेदरूपी विग्रह करने वाले

45.अनीश्वर अर्थात जो जिसका और कोई मालिक नहीं है

46.सर्वज्ञ अर्थात जो सब कुछ जानने वाले

47.परमात्मा अर्थात जो सबका अपना आपा

48.सोमसूर्याग्निलोचन अर्थात जो चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले

49.हवि अर्थात जो आहूति रूपी द्रव्य वाले

50.यज्ञमय अर्थात जो यज्ञस्वरूप वाले

51. सोम अर्थात जो उमा के सहित रूप वाले

52.पंचवक्त्र अर्थात जो पांच मुख वाले

53.सदाशिव अर्थात जो नित्य कल्याण रूप वाल

54.विश्वेश्वर अर्थात जो सारे विश्व के ईश्वर

55.वीरभद्र अर्थात जो बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले

56.गणनाथ अर्थात जो गणों के स्वामी

57.प्रजापति अर्थात जो प्रजाओं का पालन करने वाले

58.हिरण्यरेता अर्थात जो स्वर्ण तेज वाले

59.दुर्धुर्ष अर्थात जो किसी से नहीं दबने वाले

60.गिरीश अर्थात जो पहाड़ों के मालिक

61.गिरिश अर्थात जो कैलाश पर्वत पर सोने वाले

62,अनघ अर्थात जो पापरहित

63.भुजंगभूषण अर्थात जो साँप के आभूषण वाले

64.भर्ग अर्थात जो पापों को भूंज देने वाले

65.गिरिधन्वा अर्थात जो मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले

66.गिरिप्रिय अर्थात जो पर्वत प्रेमी

67.कृत्तिवासा अर्थात जो गजचर्म पहनने वाले

68.पुराराति अर्थात जो पुरों का नाश करने वाले

69.भगवान् अर्थात जो सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न

70.प्रमथाधिप अर्थात जो प्रमथगणों के अधिपति

71.मृत्युंजय अर्थात जो मृत्यु को जीतने वाले

72.सूक्ष्मतनु अर्थात जो सूक्ष्म शरीर वाले

73.जगद्व्यापी अर्थात जो जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले

74.जगद्गुरू अर्थात जो जगत् के गुरू

75.व्योमकेश अर्थात जो आकाश रूपी बाल वाले

76.महासेनजनक अर्थात जो कार्तिकेय के पिता

77.चारुविक्रम अर्थात जो सुन्दर पराक्रम वाले

78.रूद्र अर्थात जो भक्तों के दुख देखकर रोने वाले

79.भूतपति अर्थात जो भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी

80.स्थाणु अर्थात जो स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले

81.अहिर्बुध्न्य अर्थात जो कुण्डलिनी को धारण करने वाले

82.दिगम्बर अर्थात जो नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले

83.अष्टमूर्ति अर्थात जो आठ रूप वाले

84.अनेकात्मा अर्थात जो अनेक रूप धारण करने वाले

85.सात्त्विक अर्थात जो सत्व गुण वाले

86.शुद्धविग्रह अर्थात जो शुद्धमूर्ति वाले

87.शाश्वत अर्थात जो नित्य रहने वाले

88.खण्डपरशु अर्थात जो टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले

89.अज अर्थात जो जन्म रहित

90.पाशविमोचन अर्थात जो बंधन से छुड़ाने वाले

91.मृड अर्थात जो सुखस्वरूप वाले

92.पशुपति अर्थात जो पशुओं के मालिक

93.देव अर्थात जो स्वयं प्रकाश रूप

94.महादेव अर्थात जो देवों के भी देव

95.अव्यय अर्थात जो खर्च होने पर भी न घटने वाले

96.हरि अर्थात जो विष्णुस्वरूप

97.पूषदन्तभित् अर्थात जो पूषा के दांत उखाड़ने वाले

98.अव्यग्र अर्थात जो कभी भी व्यथित न होने वाले

99.दक्षाध्वरहर अर्थात जो दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाल

100.हर अर्थात जो पापों व तापों को हरने वाले

101.भगनेत्रभिद् अर्थात जो भग देवता की आंख फोड़ने वाले

102.अव्यक्त अर्थात जो इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले

103.सहस्राक्ष अर्थात जो अनंत आँख वाले

104.सहस्रपाद अर्थात जो अनंत पैर वाले

105.अपवर्गप्रद अर्थात जो कैवल्य मोक्ष देने वाले

106.अनंत अर्थात जो देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित

107.तारक अर्थात जो सबको तारने वाला

108.परमेश्वर अर्थात जो सबसे परे ईश्वर

शुक्रवार, 22 मई 2015

हिन्दुओं के १६ संस्कार, 16 Hindu rites

हिन्दुओं के १६ संस्कार -
हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए १६ संस्कार अनिवार्य माने गए हैं | शंकराचार्य जी के अनुसार- "संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा" अर्थात मानव को गुणों से युक्त करने तथा उसके दोषों को दूर करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे ही संस्कार कहते हैं | इन संस्कारों के बिना एक मानव के जीवन में और किसी अन्य जीव के जीवन में विशेष अंतर नहीं है | ये संस्कार व्यक्ति के दोषों को खत्म कर उसे गुण युक्त बनाते हैं |
भारतीय संस्कृति के अनुसार १६ संस्कार -
[१] गर्भाधान संस्कार- इस संस्कार से व्यक्ति को योग्य तथा गुणवान संतान की प्राप्त होती है | उत्तम संतान की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भ धारण करने से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए | यह संस्कार होने वाले संतान पर सकारात्मक प्रभाव डालता है |
[२] पुंसवन संस्कार- गर्भ में स्थित शिशु के बौद्धिक एवं मानसिक विकास हेतु गर्भ धारण करने के बाद दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला यह द्वितीय संस्कार है | गर्भ में स्थित शिशु के मानसिक विकास के लिए यह संस्कार अत्यंत उपयोगी है | इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है |
[३] सीमन्तोन्नयन संस्कार- माँ को प्रसन्न रखने के लिए ताकि गर्भ में स्थित शिशु सौभाग्य संपन्न हो, यह संस्कार गर्भ धारण के बाद आठवें महीने में किया जाता है | गर्भपात रोकना तथा शिशु और माँ की रक्षा करना भी इस संस्कार का प्रमुख उद्देश्य है |
[४] जातकर्म संस्कार- नवजात शिशु के नालच्छेदन से पहले इस संस्कार को करने का विधान है | नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना से यह संस्कार किया जाता है | पहले पिता विशेष पूजन करता है, उसके बाद माता शिशु को स्तनपान कराती है |
[५] नामकरण संस्कार- नवजात शिशु का उपयुक्त नाम रखने के लिए यह संस्कार शिशु के जन्म के ग्यारहवें दिन के बाद संपन्न किया जाता है | इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना चाहिए | नामकरण संस्कार इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में उसके नाम की अहम भूमिका होती है |
[६] निष्क्रमण संस्कार- निष्क्रमण का अर्थ होता है बाहर निकलना | इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है | जन्म के चौथे महीने यह संस्कार किया जाता है | तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये तीन महीने तक उसे घर में रखना चाहिए | इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए | इस संस्कार का अर्थ यह है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो | शिशु सृष्टि से अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है |
[७] अन्नप्राशन संस्कार- यह संस्कार शिशु के जन्म के छठे महीने में संपन्न किया जाता है | छठे महीने में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार किया जाता है | इस संस्कार से शिशु को अन्न खिलाने की शुरुआत की जाती है | इस संस्कार से पहले शिशु का आहार उसकी माँ का दूध होता है |
[८] चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कार- यह संस्कार शिशु के जन्म के बाद पहले, तीसरे या पाँचवे वर्ष में संपन्न किया जाता है | ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करना चाहिए | इस संस्कार में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं |
[९] विद्यारम्भ संस्कार- शिशु को उत्तम विद्या प्रदान करने के लिए यह संस्कार किया जाता है | शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये | विद्या के बिना एक पशु और मानव में कोई अंतर नहीं होता है | विद्यारम्भ का अर्थ बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है | और शिशु के शिक्षा की शुरुआत करनी है |
[१०] कर्णवेध संस्कार- शिशु की शारीरिक व्याधियों से रक्षा करने के उद्देश्य से किया जाने वाला यह दशम संस्कार है | कर्णवेधन का अर्थ होता है, कान छेदना | कान हमारे श्रवण द्वार हैं | कान छेदने से व्याधियां दूर होती हैं तथा सुनने की शक्ति भी बढ़ती है | यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है |
[११] यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार- उपनयन व्यक्ति के बौद्धिक विकास के लिये सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है | धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है | यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज देने वाला है | इसका उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास के लिये शिशु को प्रेरित करना है |
[१२] वेदारम्भ संस्कार- शिशु के ज्ञान को बढ़ाने की कामना से यह संस्कार संपन्न किया जाता है | इस संस्कार का अर्थ है कि शिशु को ज्ञान ग्रहण करना शुरू कर देना चाहिए | प्राचीन काल में व्यक्ति को वेदों का अध्ययन कराया जाता था तथा अन्य विशेष विद्याएं व्यक्ति को सिखाई जाती थी | व्यक्ति को ज्ञान सिखाने के लिए योग्य गुरु के पास भेजा जाता था |
[१३] केशान्त संस्कार- गुरुकुल छोड़ने से पहले किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार | यह संस्कार गुरु के पास शिक्षा पूरी कर लेने के बाद संपन्न किया जाता था | विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद व्यक्ति के समावर्तन संस्कार से पहले बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी |
[१४] समावर्तन संस्कार- गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला यह चतुर्दश संस्कार है | इस संस्कार से पहले ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था | इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था | इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे | इस उपाधि से वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था | आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद लेकर अपने घर के लिये जाता था |
[१५] पाणिग्रहण संस्कार- पति-पत्नी को एक-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार | वेदाध्ययन करने के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था | लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था | वैदिक काल से पहले जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था | हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना की | आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है |
[१६] अन्त्येष्टि संस्कार- व्यक्ति की मृत्यु के बाद किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार | इसे अंतिम या अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहते हैं | धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मरे हुए शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं | शास्त्रों में इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है | जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है | प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है | उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष है | मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है | इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया है |
From :- ज्योतिर्विद पं॰ मनीष तिवारी ( datia)

मंगलवार, 19 मई 2015

मंगलवार व्रत कथा

ऋषिनगर में केशवदत्त ब्राह्मण अपनी पत्नी अंजलि के साथ रहता था। केशवदत्त के घर में धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी। नगर में सभी केशवदत्त का सम्मान करते थे, लेकिन केशवदत्त संतान नहीं होने से बहुत चिंतित रहता था।
दोनों पति-पत्नी प्रति मंगलवार को मंदिर में जाकर हनुमानजी की पूजा करते थे। विधिवत मंगलवार का व्रत करते हुए कई वर्ष बीत गए। ब्राह्मण बहुत निराश हो गया, लेकिन उसने व्रत करना नहीं छोड़ा।
कुछ दिनों के बाद केशवदत्त हनुमानजी की पूजा करने के लिए जंगल में चला गया। उसकी पत्नी अंजलि घर में रहकर मंगलवार का व्रत करने लगी। दोनों पति-पत्नी पुत्र-प्राप्ति के लिए मंगलवार का विधिवत व्रत करने लगे। कुछ दिनों बाद अंजलि ने अगले मंगलवार को व्रत किया लेकिन किसी कारणवश उस दिन अंजलि हनुमानजी को भोग नहीं लगा सकी और उस दिन वह सूर्यास्त के बाद भूखी ही सो गई।
अगले मंगलवार को हनुमानजी को भोग लगाए बिना उसने भोजन नहीं करने का प्रण कर लिया। छः दिन तक अंजलि भूखी-प्यासी रही। सातवें दिन मंगलवार को अंजलि ने हनुमानजी की पूजा की, लेकिन तभी भूख-प्यास के कारण अंजलि बेहोश हो गई।
हनुमानजी ने उसे स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा- ‘उठो पुत्री! मैं तुम्हारी पूजा-पाठ से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें सुंदर और सुयोग्य पुत्र होने का वर देता हूँ।’ यह कहकर हनुमानजी अंतर्धान हो गए। तत्काल अंजलि ने उठकर हनुमानजी को भोग लगाया और स्वयं भोजन किया।
हनुमानजी की अनुकम्पा से अंजलि ने एक सुंदर शिशु को जन्म दिया। मंगलवार को जन्म लेने के कारण उस बच्चे का नाम मंगलप्रसाद रखा गया। कुछ दिनों बाद अंजलि का पति केशवदत्त भी घर लौट आया। उसने मंगल को देखा तो अंजलि से पूछा- ‘यह सुंदर बच्चा किसका है?’ अंजलि ने खुश होते हुए हनुमानजी के दर्शन देने और पुत्र प्राप्त होने का वरदान देने की सारी कथा सुना दी। लेकिन केशवदत्त को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसके मन में पता नहीं कैसे यह कलुषित विचार आ गया कि अंजलि ने उसके साथ विश्वासघात किया है। अपने पापों को छिपाने के लिए अंजलि झूठ बोल रही है।
केशवदत्त ने उस बच्चे को मार डालने की योजना बनाई। एक दिन केशवदत स्नान के लिए कुएँ पर गया। मंगल भी उसके साथ था। केशवदत्त ने मौका देखकर मंगल को कुएँ में फेंक दिया और घर आकर बहाना बना दिया कि मंगल तो कुएँ पर मेरे पास पहुँचा ही नहीं। केशवदत्त के इतने कहने के ठीक बाद मंगल दौड़ता हुआ घर लौट आया।
केशवदत्त मंगल को देखकर बुरी तरह हैरान हो उठा। उसी रात हनुमानजी ने केशवदत्त को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा- ‘तुम दोनों के मंगलवार के व्रत करने से प्रसन्न होकर, पुत्रजन्म का वर मैंने दिया था। फिर तुम अपनी पत्नी को कुलटा क्यों समझते हो!’
उसी समय केशवदत्त ने अंजलि को जगाकर उससे क्षमा माँगते हुए स्वप्न में हनुमानजी के दर्शन देने की सारी कहानी सुनाई। केशवदत्त ने अपने बेटे को हृदय से लगाकर बहुत प्यार किया। उस दिन के बाद सभी आनंदपूर्वक रहने लगे।
मंगलवार का विधिवत व्रत करने से केशवदत्त और उनके सभी कष्ट दूर हो गए। इस तरह जो स्त्री-पुरुष विधिवत मंगलवार का व्रत करके व्रतकथा सुनते हैं, हनुमानजी उनके सभी कष्ट दूर करके घर में धन-संपत्ति का भंडार भर देते हैं। शरीर के सभी रक्त विकार के रोग भी नष्ट हो जाते हैं।

मंगलवार, 12 मई 2015

सोमवार व्रत कथा

एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे। इतना सब कुछ होने पर भी वह व्यापारी बहुत दुखी था क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।

दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।

पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।

उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।’

भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- ‘हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।’

इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- ‘नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।’

पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- ‘तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूँ। लेकिन इसका पुत्र १६ वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।’

उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के १६ वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।

भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियाँ भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया। व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था।

जब पुत्र १२ वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने पुत्र के मामा को बुलाया और कहा कि पुत्र को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। लड़का अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहाँ भी मामा और भांजा रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।

लंबी यात्रा के बाद मामा और भांजा एक नगर में पहुँचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आँख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दे। इससे उसकी बदनामी होगी।

वर के पिता ने लडके को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूँ। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूँगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊँगा।

वर के पिता ने इसी संबंध में मामा से बात की। मामा ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। लडके को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया। लडका जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- ‘राजकुमारी, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूँ। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।’

जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर लडका अपने मामा के साथ वाराणसी पहुँच गया। गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया। जब उसकी आयु १६ वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा भांजे को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।

मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- ‘प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।’

भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर देखा तो पार्वतीजी से बोले- ‘पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे १६ वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।’

पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- ‘हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।’ पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।

शिक्षा समाप्त करके लडका मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुँचे, जहाँ उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।

राजा ने उसको तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा मामा भांजा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।

रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। नगर में पहुँचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।

भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।

व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुँचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- ‘हे श्रेष्ठी ! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।’ व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।

सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियाँ लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं।

सोमवार, 11 मई 2015

परिक्रमा का महत्त्व importance of parikrama

जब हम मंदिर जाते है तो हम भगवान की परिक्रमा जरुर लगाते है. पर क्या कभी हमने ये सोचा है कि देव मूर्ति की परिक्रमा क्यो की जाती है? शास्त्रों में लिखा है जिस स्थान पर मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो, उसके मध्य बिंदु से लेकर कुछ दूरी तक दिव्य प्रभा अथवा प्रभाव रहता है,यह निकट होने पर अधिक गहरा और दूर दूर होने पर घटता जाता है, इसलिए प्रतिमा के निकट परिक्रमा करने से दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल से निकलने वाले तेज की सहज ही प्राप्ती हो जाती है.

कैसे करे परिक्रमा
देवमूर्ति की परिक्रमा सदैव दाएं हाथ की ओर से करनी चाहिए क्योकि दैवीय शक्ति की आभामंडल की गति दक्षिणावर्ती होती है।बाएं हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर दैवीय शक्ति के ज्योतिर्मडल की गति और हमारे अंदर विद्यमान दिव्य परमाणुओं में टकराव पैदा होता है, जिससे हमारा तेज नष्ट हो जाता है.जाने-अनजाने की गई उल्टी परिक्रमा का दुष्परिणाम भुगतना पडता है.

किस देव की कितनी परिक्रमा करनी चाहिये ?
वैसे तो सामान्यत: सभी देवी-देवताओं की एक ही परिक्रमा की जाती है परंतु शास्त्रों के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा की अलग संख्या निर्धारित की गई है।इस संबंध में धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान की परिक्रमा करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इससे हमारे पाप नष्ट होते है.सभी देवताओं की परिक्रमा के संबंध में अलग-अलग नियम बताए गए हैं.

1. – महिलाओं द्वारा “वटवृक्ष” की परिक्रमा करना सौभाग्य का सूचक है.

2. – “शिवजी” की आधी परिक्रमा की जाती है.है शिव जी की परिक्रमा करने से बुरे खयालात और अनर्गल स्वप्नों का खात्मा होता है।भगवान शिव की परिक्रमा करते समय अभिषेक की धार को न लांघे.

3. – “देवी मां” की एक परिक्रमा की जानी चाहिए.

4. – “श्रीगणेशजी और हनुमानजी” की तीन परिक्रमा करने का विधान है.गणेश जी की परिक्रमा करने से अपनी सोची हुई कई अतृप्त कामनाओं की तृप्ति होती है.गणेशजी के विराट स्वरूप व मंत्र का विधिवत ध्यान करने पर कार्य सिद्ध होने लगते हैं.

5. – “भगवान विष्णुजी” एवं उनके सभी अवतारों की चार परिक्रमा करनी चाहिए.विष्णु जी की परिक्रमा करने से हृदय परिपुष्ट और संकल्प ऊर्जावान बनकर सकारात्मक सोच की वृद्धि करते हैं.

6. – सूर्य मंदिर की सात परिक्रमा करने से मन पवित्र और आनंद से भर उठता है तथा बुरे और कड़वे विचारों का विनाश होकर श्रेष्ठ विचार पोषित होते हैं.हमें भास्कराय मंत्र का भी उच्चारण करना चाहिए, जो कई रोगों का नाशक है जैसे सूर्य को अर्घ्य देकर “ॐ भास्कराय नमः” का जाप करना.देवी के मंदिर में महज एक परिक्रमा कर नवार्ण मंत्र का ध्यान जरूरी है.इससे सँजोए गए संकल्प और लक्ष्य सकारात्मक रूप लेते हैं.

परिक्रमा के संबंध में नियम
१. – परिक्रमा शुरु करने के पश्चात बीच में रुकना नहीं चाहिए.साथ परिक्रमा वहीं खत्म करें जहां से शुरु की गई थी.ध्यान रखें कि परिक्रमा बीच में रोकने से वह पूर्ण नही मानी जाती

२. – परिक्रमा के दौरान किसी से बातचीत कतई ना करें.जिस देवता की परिक्रमा कर रहे हैं, उनका ही ध्यान करें.

३.- उलटी अर्थात बाये हाथ की तरफ परिक्रमा नहीं करनी चाहिये.

इस प्रकार देवी-देवताओं की परिक्रमा विधिवत करने से जीवन में हो रही उथल-पुथल व समस्याओं का समाधान सहज ही हो जाता है.इस प्रकार सही परिक्रमा करने से पूर्ण लाभ की प्राप्ती होती है.

रविवार, 10 मई 2015

हिंदी महीनो के नाम

सूर्य जब विभिन्न राशियों में निवास करता है। उस समय उन्हें महीने का नाम दे दिया जाता है। उन महीनों को सौर मास के नाम से जाना एवं पहचाना जाता है। सौरमास 365 दिन का और चंद्रमास 355 दिन का होने से प्रतिवर्ष 10 दिन का अंतर आ जाता है। इन दस दिनों को चंद्रमास ही माना जाता है। फिर भी ऐसे बड़े हुए दिनों को ‘मलमास’ या ‘अधिमास’ कहते हैं।
1 सूर्य जब मेष राशि में निवास करता है तब उस माह को बैसाख माह कहा जाता है।
2 सूर्य जब वृष राशि में निवास करता है उस माह को ज्येष्ठ माह कहा जाता है।
3 सूर्य जब मिथुन राशि में निवास करता है उस माह को आषाढ़ माह कहा जाता है।
4 सूर्य जब कर्क राशि में निवास करता है उस माह को श्रावण माह कहा जाता है।
5 सूर्य जब सिंह राशि में निवास करता है उस माह को भाद्रपद माह कहा जाता है।
6 सूर्य जब कन्या राशि में निवास करता है उस माह को आश्विन माह कहा जाता है।
7 सूर्य जब तुला राशि में निवास करता है उस माह को कार्तिक माह कहा जाता है।
8 सूर्य जब वृश्चिक राशि में निवास करता है उस माह को मार्गशीर्ष माह कहा जाता है।
9 सूर्य जब धनु राशि में में निवास करता है उस माह को पौष माह कहा जाता है।
10 सूर्य जब मकर राशि में में निवास करता है उस माह को माघ माह कहा जाता है।
11 सूर्य जब कुम्भ राशि में में निवास करता है उस माह को फाल्गुन माह कहा जाता है।
12 सूर्य जब मीन राशि में में निवास करता है उस माह को चैत्र माह कहा जाता है।

श्री सत्यनारायण व्रत कथा shri satayanarayan vrat katha

श्री सत्यनारायण व्रत कथा

व्यास जी ने कहा- एक समय की बात है। नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादिक अठ्ठासी हजार ऋषियों ने पुराणवेत्ता श्री सूतजी से पूछा- हे सूतजी ! इस कलियुग में वेद-विद्यारहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिलेगी तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनिश्रेष्ठ! कोई ऐसा व्रत अथवा तप कहिए जिसके करने से थोड़े ही समय में पुण्य प्राप्त हो तथा मनवांछित फल भी मिले। हमारी प्रबल इच्छा है कि हम ऐसी कथा सुनें।

सर्वशास्त्रज्ञाता श्री सूतजी ने कहा- हे वैष्णवों में पूज्य! आप सबने प्राणियों के हित की बात पूछी है। अब मैं उस श्रेष्ठ व्रत को आपसे कहूँगा जिसे नारदजी के पूछने पर लक्ष्मीनारायण भगवान ने उन्हें बताया था। कथा इस प्रकार है। आप सब सुनें। एक समय देवर्षि नारदजी दूसरों के हित की इच्छा से सभी लोकों में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुँचे। यहाँ अनेक योनियों में जन्मे प्रायः सभी मनुष्यों को अपने कर्मों के अनुसार कई दुखों से पीड़ित देखकर उन्होंने विचार किया कि किस यत्न के करने से प्राणियों के दुःखों का नाश होगा। ऐसा मन में विचार कर श्री नारद विष्णुलोक गए। वहाँ श्वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले देवों के ईश नारायण को, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे तथा वरमाला पहने हुए थे, देखकर स्तुति करने लगे। नारदजी ने कहा- “हे भगवन! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती, आपका आदि-मध्य-अन्त भी नहीं हैं। आप निर्गुण स्वरूप सृष्टि के कारण भक्तों के दुखों को नष्ट करने वाले हो। आपको मेरा नमस्कार है।” नारदजी से इस प्रकार की स्तुति सुनकर विष्णु बोले- “हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या है। आपका किस काम के लिए यहाँ आगमन हुआ है? निःसंकोच कहें।” तब नारदमुनि ने कहा- “मृत्युलोक में सब मनुष्य, जो अनेक योनियों में पैदा हुए हैं, अपने-अपने कर्मों द्वारा अनेक प्रकार के दुःखों से पीड़ित हैं। हे नाथ! यदि आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए उन मनुष्यों के सब दुःख थोड़े से ही प्रयत्न से कैसे दूर हो सकते हैं।” विष्णु भगवान ने कहा- “हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न किया है। जिस व्रत के करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह व्रत मैं तुमसे कहना चाहता हूँ। बहुत पुण्य देने वाला, स्वर्ग तथा मृत्यु दोनों में दुर्लभ, एक उत्तम व्रत है जो आज मैं प्रेमवश होकर तुमसे कहता हूँ। श्री सत्यनारायण भगवान का यह व्रत विधि-विधानपूर्वक संपन्न करके मनुष्य इस धरती पर सुख भोगकर, मरने पर मोक्ष को प्राप्त होता है।” श्री विष्णु भगवान के यह वचन सुनकर नारद मुनि बोले- “हे भगवान उस व्रत का फल क्या है? क्या विधान है? इससे पूर्व यह व्रत किसने किया है और किस दिन यह व्रत करना चाहिए। कृपया मुझे विस्तार से बताएँ।” श्री विष्णु ने कहा- “हे नारद! दुःख-शोक आदि दूर करने वाला यह व्रत सब स्थानों पर विजयी करने वाला है। भक्ति और श्रद्धा के साथ किसी भी दिन मनुष्य श्री सत्यनारायण भगवान की संध्या के समय ब्राह्मणों और बंधुओं के साथ धर्मपरायण होकर पूजा करे। भक्तिभाव से नैवेद्य, केले का फल, शहद, घी, शकर अथवा गुड़, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें (गेहूँ के अभाव में साठी का चूर्ण भी ले सकते हैं)। इन सबको भक्तिभाव से भगवान को अर्पण करें। बंधु-बांधवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। इसके पश्चात स्वयं भोजन करें। रात्रि में नृत्य-गीत आदि का आयोजन कर श्री सत्यनारायण भगवान का स्मरण करता हुए समय व्यतीत करें। कलिकाल में मृत्युलोक में यही एक लघु उपाय है, जिससे अल्प समय और अल्प धन में महान पुण्य प्राप्त हो सकता है।
द्वितीय अध्याय

सूतजी ने कहा- “हे ऋषियों! जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है उनका इतिहास कहता हूँ आप सब ध्यान से सुनें। सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण भूख और प्यास से बेचैन होकर पृथ्वी पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवान ने ब्राह्मण को देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण कर निर्धन ब्राह्मण के पास जाकर आदर के साथ पूछा-”हे विप्र! तुम नित्य ही दुःखी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते हो? हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! यह सब मुझसे कहो, मैं सुनना चाहता हूँ।” दरिद्र ब्राह्मण ने कहा- “मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ, भिक्षा के लिए पृथ्वी पर फिरता हूँ। हे भगवन यदि आप इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय जानते हों तो कृपा कर मुझे बताएँ। वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किए श्री विष्णु भगवान ने कहा- “हे ब्राह्मण! श्री सत्यनारायण भगवान मनवांछित फल देने वाले हैं। इसलिए तुम उनका पूजन करो, इससे मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाता है।” दरिद्र ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले श्री सत्यनारायण भगवान अंतर्ध्यान हो गए। जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बताया है, मैं उसको अवश्य करूँगा, यह निश्चय कर वह दरिद्र ब्राह्मण घर चला गया। परंतु उस रात्रि उस दरिद्र ब्राह्मण को नींद नहीं आई। अगले दिन वह जल्दी उठा और श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करने का निश्चय कर भिक्षा माँगने के लिए चल दिया। उस दिन उसको भिक्षा में बहुत धन मिला, जिससे उसने पूजा का सामान खरीदा और घर आकर अपने बंधु-बांधवों के साथ भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। इसके करने से वह दरिद्र ब्राह्मण सब दुःखों से छूटकर अनेक प्रकार की सम्पत्तियों से युक्त हो गया। तभी से वह विप्र हर मास व्रत करने लगा। इसी प्रकार सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो शास्त्रविधि के अनुसार करेगा, वह सब पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। आगे जो मनुष्य पृथ्वी पर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करेगा वह सब दुःखों से छूट जाएगा। इस तरह नारदजी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ व्रत मैंने तुमसे कहा। हे विप्रों! अब आप और क्या सुनना चाहते हैं, मुझे बताएँ? ऋषियों ने कहा- “हे मुनीश्वर! संसार में इस विप्र से सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया| यह हम सब सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा है।” श्री सूतजी ने कहा- “हे मुनियों! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है उन सबकी कथा सुनो। एक समय वह ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बंधु-बांधवों के साथ अपने घर पर व्रत कर रहा था। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा व्यक्ति वहाँ आया। उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर बाहर रख दिया और विप्र के मकान में चला गया। प्यास से व्याकुल लकड़हारे ने विप्र को व्रत करते देखा। वह प्यास को भूल गया। उसने उस विप्र को नमस्कार किया और पूछा- “हे विप्र! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? इस व्रत से आपको क्या फल मिलता है? कृपा करके मुझे बताएँ।” ब्राह्मण ने कहा- “सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी ही कृपा से मेरे यहाँ धन-धान्य आदि की वृद्धि हुई।” विप्र से इस व्रत के बारे में जानकर वह लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान का चरणामृत ले और भोजन करने के बाद वह अपने घर को चला गया। अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से भगवान सत्यनारायण का उत्तम व्रत करूँगा। मन में ऐसा विचार कर वह लकड़हारा लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखकर जिस नगर में धनवान लोग रहते थे, वहाँ गया। उस दिन उसे उन लकड़ियों के चौगुने दाम मिले। वह बूढ़ा लकड़हारा अतिप्रसन्न होकर पके केले, शकर, शहद, घी, दुग्ध, दही और गेहूँ का चूर्ण इत्यादि श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत की सभी सामग्री लेकर अपने घर आ गया। फिर उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजन और व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन-पुत्र आदि से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर बैकुंठ को चला गया।”
तृतीय अध्याय

श्री सूतजी ने कहा- “हे श्रेष्ठ मुनियों! अब एक और कथा कहता हूँ। पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देवस्थानों पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी सुंदर और सती साध्वी थी। भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनों ने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उस समय वहाँ साधु नामक एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार के लिए बहुत-सा धन था। राजा को व्रत करते देख उसने विनय के साथ पूछा- “हे राजन! भक्तियुक्त चित्त से यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है। कृपया आप मुझे भी बताइए।” महाराज उल्कामुख ने कहा- “हे साधु वैश्य! मैं अपने बंधु-बांधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूँ।” राजा के वचन सुनकर साधु नामक वैश्य ने आदर से कहा- “हे राजन! मुझे भी इसका सब विधान बताइए। मैं भी आपके कथानुसार इस व्रत को करूँगा। मेरे यहाँ भी कोई संतान नहीं है। मुझे विश्वास है कि इससे निश्चय ही मेरे यहाँ भी संतान होगी।” राजा से सब विधान सुन, व्यापार से निवृत्त हो, वह वैश्य खुशी-खुशी अपने घर आया। वैश्य ने अपनी पत्नी लीलावती से संतान देने वाले उस व्रत का समाचार सुनाया और प्रण किया कि जब हमारे यहाँ संतान होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा। एक दिन उसकी पत्नी लीलावती सांसारिक धर्म में प्रवृत्त होकर गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम कलावती रखा गया। इसके बाद लीलावती ने अपने पति को स्मरण दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का संकल्प किया था अब आप उसे पूरा कीजिए। साधु वैश्य ने कहा- “हे प्रिय! मैं कन्या के विवाह पर इस व्रत को करूँगा।” इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन दे वह व्यापार करने चला गया। काफी दिनों पश्चात वह लौटा तो उसने नगर में सखियों के साथ अपनी पुत्री को खेलते देखा। वैश्य ने तत्काल एक दूत को बुलाकर कहा कि उसकी पुत्री के लिए कोई सुयोग्य वर की तलाश करो। साधु नामक वैश्य की आज्ञा पाकर दूत कंचननगर पहुँचा और उनकी लड़की के लिए एक सुयोग्य वणिक पुत्र ले आया। वणिक पुत्र को देखकर साधु नामक वैश्य ने अपने बंधु-बांधवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। वैश्य विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूलगया। इस पर श्री सत्यनारायण भगवान क्रोधित हो गए। उन्होंने वैश्य को श्राप दिया कि तुम्हें दारुण दुःख प्राप्त होगा। अपने कार्य में कुशल साधु नामक वैश्य अपने जामाता सहित नावों को लेकर व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नगर में गया। दोनों ससुर-जमाई चंद्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से प्रेरित एक चोर राजा का धन चुराकर भागा जा रहा था। राजा के दूतों को अपने पीछे आते देखकर चोर ने घबराकर राजा के धन को उसी नाव में चुपचाप रख दिया, जहाँ वे ससुर-जमाई ठहरे थे। ऐसा करने के बाद वह भाग गया। जब दूतों ने उस साधु वैश्य के पास राजा के धन को रखा देखा तो ससुर-जामाता दोनों को बाँधकर ले गए और राजा के समीप जाकर बोले- “हम ये दो चोर पकड़कर लाए हैं। कृपया बताएँ कि इन्हें क्या सजा दी जाए।” राजा ने बिना उन दोनों की बात सुने ही उन्हें कारागार में डालने की आज्ञा दे दी। इस प्रकार राजा की आज्ञा से उनको कठिन कारावास में डाल दिया गया तथा उनका धन भी छीन लिया गया। सत्यनारायण भगवान के श्राप के कारण साधु वैश्य की पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भी घर पर बहुत दुखी हुई। उनके घरों में रखा धन चोर ले गए। एक दिन शारीरिक व मानसिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अति दुखित हो भोजन की चिंता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने ब्राह्मण को श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करते देखा। उसने कथा सुनी तथा प्रसाद ग्रहण कर रात को घर आई। माता ने कलावती से पूछा- “हे पुत्री! तू अब तक कहाँ रही व तेरे मन में क्या है?” कलावती बोली- “हे माता! मैंने एक ब्राह्मण के घर श्री सत्यनारायरण भगवान का व्रत होते देखा है।” कलावती के वचन सुनकर लीलावती ने सत्यनारायण भगवान के पूजन की तैयारी की। उसने परिवार और बंधुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद शीघ्र ही घर वापस लौट आएँ। साथ ही भगवान से प्रार्थना की कि हम सबका अपराध क्षमा करो। श्री सत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा- “हे राजन! जिन दोनों वैश्यों को तुमने बंदी बना रखा है, वे निर्दोष हैं, उन्हें प्रातः ही छोड़ दो अन्यथा मैं तेरा धन, राज्य, पुत्रादि सब नष्ट कर दूँगा।” राजा से ऐसे वचन कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए। प्रातःकाल राजा चंद्रकेतु ने सभा में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाया जाए। दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा ने उनसे कहा- “हे महानुभावों! तुम्हें भावीवश ऐसा कठिन दुःख प्राप्त हुआ है। अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो।” ऐसा कहकर राजा ने उनको नए-नए वस्त्राभूषण पहनवाए तथा उनका जितना धन लिया था उससे दूना लौटाकर आदर से विदा किया। दोनों वैश्व अपने घर को चल दिए।
चतुर्थ अध्याय

श्री सूतजी ने आगे कहा- “वैश्य और उसके जमाई ने मंगलाचार करके यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल पड़े। उनके थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दंडी वेषधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने उससे पूछा- “हे साधु! तेरी नाव में क्या है? अभिमानी वणिक हँसता हुआ बोला- “हे दंडी ! आप क्यों पूछते हैं? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं।” वैश्य का कठोर वचन सुनकर दंडी वेषधारी श्री सत्यनारायण भगवान ने कहा- “तुम्हारा वचन सत्य हो!” ऐसा कहकर वे वहाँ से कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए। दंडी महाराज के जाने के पश्चात वैश्य ने नित्यक्रिया से निवृत्त होने के बाद नाव को उँची उठी देखकर अचंभा किया तथा नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर मूर्च्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। मूर्च्छा खुलने पर अत्यंत शोक प्रकट करने लगा। तब उसके जामाता ने कहा- “आप शोक न करें। यह दंडी महाराज का श्राप है, अतः उनकी शरण में ही चलना चाहिए तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी।” जामाता के वचन सुनकर वह साधु नामक वैश्य दंडी महाराज के पास पहुँचा और भक्तिभाव से प्रणाम करके बोला- “मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे उसके लिए मुझे क्षमा करें।” ऐसा कहकर वैश्य रोने लगा। तब दंडी भगवान बोले- “हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से तुझे बार-बार दुःख प्राप्त हुआ है, तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है।” साधु नामक वैश्य ने कहा- “हे भगवन! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जान पाते, तब मैं अज्ञानी भला कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा करो और पहले के समान मेरी नौका को धन से पूर्ण कर दो।” उसके भक्तियुक्त वचन सुनकर श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वर देकर अंतर्ध्यान हो गए। तब ससुर व जामाता दोनों ने नाव पर आकर देखा कि नाव धन से परिपूर्ण है। फिर वह भगवान सत्यनारायण का पूजन कर जामाता सहित अपने नगर को चला। जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा। दूत ने साधु नामक वैश्य के घर जाकर उसकी पत्नी को नमस्कार किया और कहा- “आपके पति अपने दामाद सहित इस नगर के समीप आ गए हैं।” लीलावती और उसकी कन्या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं। दूत का वचन सुनकर साधु की पत्नी ने बड़े हर्ष के साथ सत्यदेव का पूजन पूर्ण किया और अपनी पुत्री से कहा- “मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ, तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जाना।” परंतु कलावती पूजन एवं प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शनों के लिए चली गई। प्रसाद की अवज्ञा के कारण सत्यदेव रुष्ट हो गए फलस्वरूप उन्होंने उसके पति को नाव सहित पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को न देख रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी। नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोती हुई देख साधु नामक वैश्य दुखित हो बोला- “हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करो।” उसके दीन वचन सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गए। आकाशवाणी हुई- “हे वैश्य! तेरी कन्या मेरा प्रसाद छोड़कर आई है इसलिए इसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटे तो इसका पति अवश्य मिलेगा।” आकाशवाणी सुनकर कलावती ने घर पहुँचकर प्रसाद खाया और फिर आकर अपने पति के दर्शन किए। तत्पश्चात साधु वैश्य ने वहीं बंधु-बांधवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। वह इस लोक का सुख भोगकर अंत में स्वर्गलोक को गया।
पंचम अध्याय

श्री सूतजी ने आगे कहा- “हे ऋषियों! मैं एक और भी कथा कहता हूँ। उसे भी सुनो। प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भगवान सत्यदेव का प्रसाद त्याग कर बहुत दुःख पाया। एक समय राजा वन में वन्य पशुओं को मारकर बड़ के वृक्ष के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति भाव से बंधु-बांधवों सहित श्री सत्यनारायण का पूजन करते देखा, परंतु राजा देखकर भी अभिमानवश न तो वहाँ गया और न ही सत्यदेव भगवान को नमस्कार ही किया। जब ग्वालों ने भगवान का प्रसाद उनके सामने रखा तो वह प्रसाद त्याग कर अपने नगर को चला गया। नगर में पहुँचकर उसने देखा कि उसका सब कुछ नष्ट हो गया है। वह समझ गया कि यह सब भगवान सत्यदेव ने ही किया है। तब वह उसी स्थान पर वापस आया और ग्वालों के समीप गया और विधिपूर्वक पूजन कर प्रसाद खाया तो सत्यनारायण की कृपा से सब-कुछ पहले जैसा ही हो गया और दीर्घकाल तक सुख भोगकर मरने पर स्वर्गलोक को चला गया। जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करेगा श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी और बंदी बंधन से मुक्त होकर निर्भय हो जाता है। संतानहीन को संतान प्राप्त होती है तथा सब मनोरथ पूर्ण होकर अंत में वह बैकुंठ धाम को जाता है। जिन्होंने पहले इस व्रत को किया अब उनके दूसरे जन्म की कथा भी सुनिए। शतानंद नामक ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में जन्म लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति कर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नाम के महाराज, राजा दशरथ बने और श्री रंगनाथ का पूजन कर बैकुंठ को प्राप्त हुए। साधु नाम के वैश्य ने धर्मात्मा व सत्यप्रतिज्ञ राजा मोरध्वज बनकर अपनी देह को आरे से चीरकर दान करके मोक्ष को प्राप्त हुआ। महाराज तुंगध्वज स्वयंभू मनु हुए? उन्होंने बहुत से लोगों को भगवान की भक्ति में लीन कर मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भील अगले जन्म में गुह नामक निषाद राजा हुआ, जिसने भगवान राम के चरणों की सेवा कर मोक्ष प्राप्त किया