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शुक्रवार, 22 मई 2015

हिन्दुओं के १६ संस्कार, 16 Hindu rites

हिन्दुओं के १६ संस्कार -
हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए १६ संस्कार अनिवार्य माने गए हैं | शंकराचार्य जी के अनुसार- "संस्कारों हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्याद्दोषापनयनेन वा" अर्थात मानव को गुणों से युक्त करने तथा उसके दोषों को दूर करने के लिए जो कर्म किया जाता है, उसे ही संस्कार कहते हैं | इन संस्कारों के बिना एक मानव के जीवन में और किसी अन्य जीव के जीवन में विशेष अंतर नहीं है | ये संस्कार व्यक्ति के दोषों को खत्म कर उसे गुण युक्त बनाते हैं |
भारतीय संस्कृति के अनुसार १६ संस्कार -
[१] गर्भाधान संस्कार- इस संस्कार से व्यक्ति को योग्य तथा गुणवान संतान की प्राप्त होती है | उत्तम संतान की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भ धारण करने से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए | यह संस्कार होने वाले संतान पर सकारात्मक प्रभाव डालता है |
[२] पुंसवन संस्कार- गर्भ में स्थित शिशु के बौद्धिक एवं मानसिक विकास हेतु गर्भ धारण करने के बाद दूसरे या तीसरे महीने किया जाने वाला यह द्वितीय संस्कार है | गर्भ में स्थित शिशु के मानसिक विकास के लिए यह संस्कार अत्यंत उपयोगी है | इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है |
[३] सीमन्तोन्नयन संस्कार- माँ को प्रसन्न रखने के लिए ताकि गर्भ में स्थित शिशु सौभाग्य संपन्न हो, यह संस्कार गर्भ धारण के बाद आठवें महीने में किया जाता है | गर्भपात रोकना तथा शिशु और माँ की रक्षा करना भी इस संस्कार का प्रमुख उद्देश्य है |
[४] जातकर्म संस्कार- नवजात शिशु के नालच्छेदन से पहले इस संस्कार को करने का विधान है | नवजात शिशु के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की कामना से यह संस्कार किया जाता है | पहले पिता विशेष पूजन करता है, उसके बाद माता शिशु को स्तनपान कराती है |
[५] नामकरण संस्कार- नवजात शिशु का उपयुक्त नाम रखने के लिए यह संस्कार शिशु के जन्म के ग्यारहवें दिन के बाद संपन्न किया जाता है | इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना चाहिए | नामकरण संस्कार इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में उसके नाम की अहम भूमिका होती है |
[६] निष्क्रमण संस्कार- निष्क्रमण का अर्थ होता है बाहर निकलना | इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है | जन्म के चौथे महीने यह संस्कार किया जाता है | तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये तीन महीने तक उसे घर में रखना चाहिए | इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए | इस संस्कार का अर्थ यह है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो | शिशु सृष्टि से अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है |
[७] अन्नप्राशन संस्कार- यह संस्कार शिशु के जन्म के छठे महीने में संपन्न किया जाता है | छठे महीने में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार किया जाता है | इस संस्कार से शिशु को अन्न खिलाने की शुरुआत की जाती है | इस संस्कार से पहले शिशु का आहार उसकी माँ का दूध होता है |
[८] चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कार- यह संस्कार शिशु के जन्म के बाद पहले, तीसरे या पाँचवे वर्ष में संपन्न किया जाता है | ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करना चाहिए | इस संस्कार में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं |
[९] विद्यारम्भ संस्कार- शिशु को उत्तम विद्या प्रदान करने के लिए यह संस्कार किया जाता है | शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये | विद्या के बिना एक पशु और मानव में कोई अंतर नहीं होता है | विद्यारम्भ का अर्थ बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है | और शिशु के शिक्षा की शुरुआत करनी है |
[१०] कर्णवेध संस्कार- शिशु की शारीरिक व्याधियों से रक्षा करने के उद्देश्य से किया जाने वाला यह दशम संस्कार है | कर्णवेधन का अर्थ होता है, कान छेदना | कान हमारे श्रवण द्वार हैं | कान छेदने से व्याधियां दूर होती हैं तथा सुनने की शक्ति भी बढ़ती है | यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है |
[११] यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार- उपनयन व्यक्ति के बौद्धिक विकास के लिये सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है | धार्मिक और आधात्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है | यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज देने वाला है | इसका उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास के लिये शिशु को प्रेरित करना है |
[१२] वेदारम्भ संस्कार- शिशु के ज्ञान को बढ़ाने की कामना से यह संस्कार संपन्न किया जाता है | इस संस्कार का अर्थ है कि शिशु को ज्ञान ग्रहण करना शुरू कर देना चाहिए | प्राचीन काल में व्यक्ति को वेदों का अध्ययन कराया जाता था तथा अन्य विशेष विद्याएं व्यक्ति को सिखाई जाती थी | व्यक्ति को ज्ञान सिखाने के लिए योग्य गुरु के पास भेजा जाता था |
[१३] केशान्त संस्कार- गुरुकुल छोड़ने से पहले किया जाने वाला त्रयोदश संस्कार | यह संस्कार गुरु के पास शिक्षा पूरी कर लेने के बाद संपन्न किया जाता था | विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद व्यक्ति के समावर्तन संस्कार से पहले बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी |
[१४] समावर्तन संस्कार- गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने की कामना से किया जाने वाला यह चतुर्दश संस्कार है | इस संस्कार से पहले ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था | इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था | इस संस्कार के बाद उसे विद्या स्नातक की उपाधि आचार्य देते थे | इस उपाधि से वह गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था | आचार्यो एवं गुरुजनों से आशीर्वाद लेकर अपने घर के लिये जाता था |
[१५] पाणिग्रहण संस्कार- पति-पत्नी को एक-सूत्र में बाँधने वाला पंचदश संस्कार | वेदाध्ययन करने के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था | लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था | वैदिक काल से पहले जब हमारा समाज संगठित नहीं था तो उस समय उच्छृंखल यौनाचार था | हमारे मनीषियों ने इस उच्छृंखलता को समाप्त करने के लिये विवाह संस्कार की स्थापना की | आज उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है कि हमारा समाज सभ्य और सुसंस्कृत है |
[१६] अन्त्येष्टि संस्कार- व्यक्ति की मृत्यु के बाद किया जाने वाला षष्ठदश संस्कार | इसे अंतिम या अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहते हैं | धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मरे हुए शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं | शास्त्रों में इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है | जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है | प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है | उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष है | मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार फल भोगता है | इसी परिकल्पना के तहत मृत देह की विधिवत क्रिया है |
From :- ज्योतिर्विद पं॰ मनीष तिवारी ( datia)

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